+91-8707 54 2255

“क्यों मैं?” से “धन्यवाद, भगवान” तक — एक माँ की स्वीकृति, धैर्य और निस्वार्थ प्रेम की यात्रा

मुझे आज भी वह दिन याद है जब मुझे पता चला कि मेरे बेटे को ऑटिज़्म है। सबसे पहला काम मैंने किया — गूगल पर “ऑटिज़्म” सर्च करना। इंटरनेट पर बहुत सारी जानकारी मिली — कुछ समझ में आने वाली, कुछ डराने वाली। पढ़ने के बाद मेरे मन में बस एक ही सवाल गूंज रहा था — “क्यों मैं? क्यों मेरा बच्चा? क्या मेरा बेटा कभी ठीक होगा? कितना समय लगेगा? सब कैसे ठीक होगा?”
ओम को ऑटिज़्म है — इस सच्चाई को स्वीकार करने में मुझे लगभग छह महीने लग गए। मेरा दिल और दिमाग इसे मानने के लिए तैयार नहीं थे। मैं खुद को समझाती रहती थी कि वह बस शरारती है, बड़ा होगा तो सब ठीक हो जाएगा। मैंने सोचा कि स्कूल में डालने से फर्क पड़ेगा, लेकिन वह वहाँ रुकता ही नहीं था। उसे हर समय मेरी ज़रूरत होती थी और वह किसी की कमांड नहीं लेता था।
शुक्र है कि मुझे एक ऐसा स्कूल मिला जहाँ मुझे शैडो टीचर के रूप में उसके साथ रहने की अनुमति मिल गई। मैं उसे छोटी-छोटी बातें सिखाती थी — किसी का लंच नहीं लेना, अपनी बोतल से पानी पीना। सुधार दिख रहा था, लेकिन मैं संतुष्ट नहीं थी।
जब मैंने परिवार को बताया, तो जैसा सोचा था वैसा ही हुआ — दोष मुझ पर आ गया। मेरी नौकरी, मेरी परवरिश और मेरे फैसलों पर सवाल उठे। सबको लगा कि मैं ज़्यादा सोच रही हूँ। थेरेपी के खिलाफ आवाज़ें उठीं। फिर भी मैंने चुपचाप ऑनलाइन थेरेपी शुरू कर दी।
सबसे कठिन बात यह थी कि सिर्फ ससुराल ही नहीं, मेरे अपने माता-पिता भी इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। एक समय ऐसा भी आया जब मेरे पति भी थेरेपी के खिलाफ थे। वह दौर बेहद अकेला और भावनात्मक रूप से थका देने वाला था, लेकिन मुझे अपने बच्चे के लिए मज़बूत बनना था। मैं उसे अपने स्कूल ले जाने लगी और वहीं उसकी थेरेपी कराती रही। धीरे-धीरे बदलाव दिखने लगे।
फिर मैंने नौकरी से छुट्टी ली ताकि मैं पूरी तरह उसके लिए प्रयास कर सकूँ। दोबारा थेरेपी शुरू की तो एक रिश्तेदार ने कठोर शब्द कहे। मैं डर गई और थेरेपी बंद कर दी। उसके बाद मेरी पूरी दिनचर्या मेरे बेटे के इर्द-गिर्द घूमने लगी। मैंने घर पर उसके साथ काम जारी रखा और धीरे-धीरे सुधार हुआ।
जब परिवार ने बदलाव देखा, तो उन्होंने एक साल तक थेरेपी जारी रखने की अनुमति दी। इस बार प्रगति और भी स्पष्ट थी, और आखिरकार परिवार ने भी स्वीकार किया कि हस्तक्षेप ज़रूरी था।
पीछे मुड़कर देखा तो समझ आया कि हमने एक बड़ी गलती की थी — हमने कभी सीमाएँ तय नहीं कीं। जो माँगा, दे दिया… बस वह परेशान न हो। बाहर गुस्सा किया तो फोन दे दिया। हम सोचते रहे कि बड़ा होकर समझ जाएगा, लेकिन सच्चाई यह है कि जो पैटर्न समय पर नहीं सुधरते, वे आगे चलकर और कठिन हो जाते हैं। वह “ना” सुनना कैसे सीखेगा, अगर हमने कभी “ना” कहा ही नहीं?
सबसे मुश्किल था समाज और परिवार के ताने सुनना —
“पहले ध्यान नहीं दिया, अब ज़्यादा परेशान कर रही हो।”
“दिमाग में कमी है क्या?”
ऐसे सवाल दिल को चोट पहुँचाते थे। इन सबके कारण हम उसे बाहर ले जाना भी बंद कर देते थे। लेकिन धीरे-धीरे हमने फैसला किया कि अब हम डरेंगे नहीं।
हमने उसकी ताकत पर ध्यान देना शुरू किया। उसकी पढ़ाई बहुत अच्छी थी — वही उसकी पहचान बनी। जब किसी ने नकारात्मक टिप्पणी की, तो हमने कहा — “उससे पढ़ाई के बारे में पूछिए।” लोगों का नज़रिया बदलने लगा।
आज वह हर जगह जाता है, लोगों से मिलता है। चुनौतियाँ अभी भी हैं, लेकिन हमने उनके साथ जीना सीख लिया है। हमने लेबल लगाना बंद कर दिया। उसकी शरारतों को जिज्ञासा समझना शुरू किया। समाज के हिसाब से उसे बदलने के बजाय हमने खुद को उसके अनुसार ढालना शुरू किया।
वह ऊर्जा से भरा बच्चा है — उससे अचानक शांत बैठने की उम्मीद कैसे कर सकते थे? सच तो यह है कि हमने उसे धैर्य सिखाया ही नहीं था। जैसे ही हमने सिखाना शुरू किया, उसने सीखने की कोशिश भी शुरू कर दी।
स्वीकार्यता ने सब बदल दिया। हमने यह भी सीखा कि बार-बार थेरेपी बदलना समाधान नहीं है। प्रगति समय लेती है। कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं होता।
आज मैं आभारी हूँ कि परिवार का समर्थन मिला। मेरा बेटा बहुत बेहतर हो गया है। भगवान का शुक्र है — और मेरी थेरेपिस्ट का भी, जिनका इस यात्रा में बड़ा योगदान रहा।
इस सफर ने मुझे धैर्य सिखाया। पहले मुझे हर चीज़ जल्दी चाहिए होती थी। अपेक्षाएँ रखती थी, और पूरी न हों तो परेशान हो जाती थी। अब मैंने साथ चलना सीखा है। मैंने अपने बच्चे के साथ वे छोटे-छोटे पल जीने शुरू किए, जो शायद पहले छूट गए थे।
मेरा बच्चा बहुत अच्छा है। अब मैं उसकी कमियाँ नहीं, उसकी ताकत देखती हूँ। उसने मुझे “मम्मा” तीन साल छह महीने में कहा — क्योंकि मैं बिना बुलाए भी उसके पास उपलब्ध रहती थी। लंबे समय तक वह फोन की दुनिया में खोया रहा, लेकिन आज ओम सच में हमारा है —
“मम्मा का ओम, और ओम की मम्मा।”
वह बहुत भावुक बच्चा है। जिससे एक बार जुड़ जाए, उसके लिए पूरी तरह समर्पित हो जाता है — और हाँ, थोड़ा शरारती अभी भी है।
अब 2026 में हमारा नजरिया सरल है — अच्छे विचार रखो। सब ठीक है, और सब ठीक होगा। हमें भीड़ नहीं चाहिए, बस कुछ अच्छे लोग चाहिए।
ओम मेरा सबसे बड़ा शिक्षक है। उसने मुझे धैर्य, हीलिंग, खुला मन, आत्मविश्वास और सच्ची स्वीकार्यता सिखाई है। सबसे बढ़कर — प्यार, उम्मीद और जीवन को नए नजरिए से देखना सिखाया है।
जो कभी संघर्ष लगता था, वह आज शक्ति और कृतज्ञता की यात्रा बन चुका है।
और आज हम आगे बढ़ रहे हैं — विश्वास के साथ, पहले से ज़्यादा शांत, पहले से ज़्यादा मजबूत… और साथ-साथ।

Mother of a very smart, talented, emotionally intelligent and a loveable neurodivergent Kid.

When my son was three and a half, we knew something wasn’t right. He wouldn’t respond to his name. He was constantly distracted and had no concept of waiting. Social interaction was almost absent. He didn’t play with other children and preferred to stay on his own. His food choices were extremely limited. Even simple instructions felt like a struggle, as we did not know the reason.
That’s when we decided to enroll him at Creative Mind therapy center. It was not an easy decision, but it was the most important one we made. There we understood that many of these challenges are common in neurodivergent children because they do not automatically learn from their environment the way other children might. Skills like responding to a name, observing peers, picking up social cues, or learning through imitation don’t always develop naturally. Without early intervention, these patterns can become habits, and over time, they become much harder to change.
My son began a structured early intervention program that included speech therapy, occupational therapy, and behavioural therapy. Speech therapy helped him understand language and communicate his needs. Occupational therapy supported his focus, sensory regulation, and daily routines. Behavioural therapy worked on attention, following instructions, waiting, and turn-taking. Alongside this, the SCG group (Social Communication Group) at Creative Mind played a tremendous role in building his social confidence. It gave him guided opportunities to practice conversation, peer play, and group interaction in a supportive environment.
Now after 3 years on continuous assessment and therapy, my son has achieved all the milestones, what his peer’s supposed to have. Now, he is in Class 1, youngest one in his class, has friends, shares classroom stories, understands logic and reasoning, and is a class topper. The gap, which we felt 3 years back, is fully covered only because of early intervention. It surely gave him the foundation to grow into his strengths.
